अगर आप भी यह सोचती हैं कि कम समय साथ रहने के बावजूद बच्चे पिता की ओर ज्यादा क्यों आकर्षित होता है, तो डॉक्टर चांदनी के अनुसार इसकी प्रमुख वजह यह है कि पिता ज्यादातर समय बच्चे के साथ खेल-कूद और मस्ती में बिताते हैं, जबकि मां का अधिकतर समय बच्चे की देखभाल, दिनचर्या और अनुशासन संभालने में चला जाता है। इसी वजह से बच्चे उनकी तरफ जयादा झुकाव महसूस करते हैं।
आमतौर पर बच्चे ज्यादातर समय मां के साथ बिताते हैं, लेकिन इसके बावजूद कई बार उनका झुकाव पिता की ओर ज्यादा दिखाई देता है। यह बात कई पेरेंट्स के लिए हैरान करने वाली हो सकती है। नवभारत टाइम्स डॉट कॉम से खास बातचीत में
डॉक्टर चांदनी इस संबंध में कहती हैं कि समय और लगाव दोनों एक जैसी चीज नहीं होते। बच्चे का भावनात्मक जुड़ाव इस बात पर ज्यादा निर्भर करता है कि वह किसी के साथ कैसे समय बिताता है, न कि कितनी देर साथ रहता है।
मां हमेशा सिखाती हैं अनुशासन
एक्सपर्ट आगे बताती हैं कि ज्यादातर घरों में मां बच्चे की रोजमर्रा की जरूरतें जैसे खाना, पढ़ाई और अनुशासन संभालती हैं। इसलिए बच्चा मां को जिम्मेदारी, नियम और देखभाल से जोड़कर देखने लगता है।
पिता संग मिलता है मस्ती का मौका
डॉक्टर चांदनी कहती हैं कि
पिता भले ही कम समय के लिए बच्चों के साथ रहते हों, लेकिन उस दौरान वे अक्सर उनके साथ खेलते हैं, मस्ती करते हैं और हल्की-फुल्की मजेदार बातचीत करते हैं। इसी वजह से बच्चा उनके साथ ज्यादा आरामदायक और खुश महसूस करता है।
मां को मान लेते हैं जरूरी हिस्सा
चूंकि
मां हमेशा बच्चे की देखभाल में लगी रहती हैं और उसकी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करती हैं, इसलिए बच्चा उन्हें अपने जीवन का एक स्थिर और जरूरी हिस्सा भी मानने लगता है। वह मां को कम अहमियत नहीं देता, बल्कि उनकी मौजूदगी को स्वाभाविक रूप से लेने लगता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे हम अपने पैरों के नीचे की जमीन पर ज्यादा ध्यान नहीं देते।
फिर बच्चा दोनों अनुभवों से करता है चयन
बच्चे का दिमाग मां और पिता के साथ होने वाले अलग-अलग भावनात्मक अनुभवों को अलग तरह से महसूस करता है। इसलिए स्वाभाविक रूप से उन्हें वह माहौल ज्यादा पसंद आता है जहां कम दबाव हो, ज्यादा आराम मिले और साथ में खेल-कूद या मजेदार एक्टिविटी शामिल हों।
ज्यादा साथ रहने से भी आती है दूरी
यकीन करना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन कई बार बहुत ज्यादा लगातार साथ रहना भी बच्चे और माता-पिता के बीच हल्का तनाव पैदा कर सकता है। जो
माता-पिता बच्चे की रोजमर्रा की देखभाल करते हैं, वही अक्सर उसे अनुशासन और नियम भी सिखाते हैं। यह जिम्मेदारी आमतौर पर मां के हिस्से में ज्यादा आती है, इसलिए बच्चा मां को प्यार के साथ-साथ सीमाओं और सख्ती से भी जोड़ने लगता है।
समय की कमी भी है एक वजह
माता-पिता कम समय के लिए साथ होते हैं, वे उस समय बच्चे पर पूरा ध्यान देते हैं। बच्चे यह बात जल्दी समझ लेते हैं कि ऐसे समय में डांट-फटकार या सख्ती कम होती है और इसलिए उनके लिए पिता एक ऐसे व्यक्ति बन जाते हैं जिनके साथ उम्मीदें कम और मस्ती ज्यादा होती है। मदर्स को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह प्यार की कमी नहीं है, बल्कि परिवार में जिम्मेदारियों और भूमिकाओं के बंटवारे का सामान्य परिणाम है।
मां को उठाने चाहिए ये कदम
ऐसी स्थिति में मदर्स को सबसे पहले पिता के साथ रिश्ते की तुलना करना बंद करना चाहिए और बच्चे के साथ अपने बातचीत करने के तरीके पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, यह कोशिश करनी चाहिए कि बच्चे के साथ ऐसा समय बिताया जाए जो सिर्फ देखभाल या सुधार तक सीमित न हो, बल्कि उसमें खेल, मस्ती या बिना किसी योजना के साथ रहना भी शामिल हो।
अगर सख्ती और अनुशासन वाले पलों के साथ-साथ खुशी और हल्के-फुल्के और मजेदार पलों को भी बढ़ाया जाए, तो धीरे-धीरे बच्चे के मन में मां के प्रति अनुभव और जुड़ाव बेहतर होने लगता
पिता कैसे संभाले यह स्थिति
इस स्थिति को संतुलित करने में पिता भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। वे बच्चे की दिनचर्या और अनुशासन में सक्रिय रूप से शामिल होकर मां पर सिर्फ सीमाएं तय करने की जिम्मेदारी का दबाव कम कर सकते हैं।
वहीं, जब दोनों माता-पिता जिम्मेदारी और आनंद को समान रूप से बांटते हैं, तो बच्चे का जुड़ाव मां और पिता दोनों के साथ संतुलित रूप से विकसित होता है। लेकिन अगर पिता केवल मस्ती वाले पलों में ही शामिल रहते हैं, तो यह असंतुलन को सुधारने के बजाय और बढ़ा सकता है।
बच्चे पेरेंट्स का चुनाव नहीं करते
लगाव सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि बच्चे ने किसी के साथ कितना समय बिताया, बल्कि इस पर भी निर्भर करता है कि उस समय का अनुभव कैसा था।
बच्चे किसी एक माता-पिता को दूसरे से ज्यादा नहीं चुनते, बल्कि वे अपने रोजमर्रा के अनुभवों के आधार पर दोनों से अलग-अलग तरह से जुड़ते हैं।
जब इस बात को सही तरीके से समझ लिया जाता है, तो तुलना, अपराधबोध और तनाव कम हो जाता है और स्थिति को बेहतर और व्यावहारिक तरीके से संभाला जा सकता है।
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