रंगों की पसंद और नापसंद कहीं बन न जाए दूरी की वजह

होली का नाम आते ही कुछ लोगों के चेहरे खिल उठते हैं। रंग, दोस्तों की टोली, गाना, नाच, मिठाई और पूरा दिन मस्ती। लेकिन कुछ लोगों के लिए यही होली थकाने वाली, भारी या असहज करने वाली हो सकती है। अब सोचिए, अगर एक पार्टनर होली को पूरे दिल से जीना चाहता हो और दूसरा उससे बचना चाहता हो, तो रिश्ते में टकराव आना स्वाभाविक है। गेटवे ऑफ हीलिंग की संस्थापक और मनोचिकित्सक डॉ. चांदनी तुगनैत कहती हैं कि असल में यह टकराव सिर्फ त्योहार को लेकर उनकी सोच के बीच में नहीं बल्कि उम्मीदों का होता है।

पसंद का फर्क, प्यार की कमी नहीं

रिश्तों में एक बहुत बड़ी गलतफहमी यह होती है कि अगर पार्टनर को वही चीज पसंद नहीं जो आपको पसंद है, तो वह आपसे कम जुड़ा हुआ है। लेकिन सच्चाई यह है कि हर इंसान का स्वभाव अलग होता है। कोई बाहर जाकर सेलिब्रेट करना पसंद करता है, तो कोई शांति में समय बिताना। होली के मामले में यह फर्क और साफ दिखता है। यह समझना जरूरी है कि त्योहार को अलग तरीके से देखना, प्यार की कमी नहीं है।

बातचीत से आधा तनाव कम हो सकता है

अगर होली से पहले ही यह बात साफ कर ली जाए कि कौन क्या चाहता है, तो गलतफहमियां कम हो जाती हैं। हो सकता है कि एक पार्टनर कुछ घंटों के लिए शामिल हो जाए और फिर लौट आए। या फिर दोनों मिलकर एक शांत तरीके से होली मनाने का तरीका खोज लें। समस्या तब होती है जब बात मन में रह जाती है और त्योहार वाले दिन बहस बन जाती है।

सीमाएं तय करना गलत नहीं है

अगर किसी को रंगों से एलर्जी है, भीड़ से डर लगता है या उसे पिछले अनुभव खराब लगे हैं, तो उसकी सीमा का सम्मान होना चाहिए। प्यार में साथ होना जरूरी है, लेकिन हर चीज में एक जैसा होना जरूरी नहीं। अगर एक पार्टनर साफ कह रहा है कि वह रंग नहीं लगवाना चाहता, तो इसे मजाक में उड़ाना या दबाव डालना रिश्ते को कमजोर कर सकता है।

अलग-अलग तरीके से भी साथ रहना संभव है

रिश्ते की खूबसूरती यह है कि दो अलग लोग एक साथ रहते हैं। हो सकता है कि एक बाहर जाकर दोस्तों के साथ होली खेले और दूसरा घर पर शांति से समय बिताए। दिन के अंत में दोनों मिलकर खाना खाएं या समय बिताएं। यह भी साथ ही है। साथ का मतलब हर पल एक जैसा होना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की जगह को समझना है

जब एक बहुत उत्साहित हो और दूसरा असहज

जिसे होली पसंद है, वह इसे साथ समय बिताने का मौका मानता है। अगर पार्टनर मना करे, तो उसे बुरा लग सकता है। दूसरी तरफ, जिसे होली पसंद नहीं, वह भीड़ या शोर से असहज हो सकता है। असल मुद्दा त्योहार नहीं, बल्कि अलग पसंद और समझ की कमी है।

सलाह

डॉ. चांदनी तुगनैत कहती हैं कि होली का असली मतलब खुशी है। अगर त्योहार की वजह से रिश्ते में तनाव आ रहा है, तो शायद रुककर यह देखने की जरूरत है कि असली मुद्दा क्या है। त्योहार एक दिन का होता है, लेकिन रिश्ते रोज के होते हैं। अगर दोनों एक-दूसरे की पसंद और सीमाओं का सम्मान कर लें, तो होली रंगों से नहीं, समझ से भी खूबसूरत बन सकती है।

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