मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में सबसे बड़ा मिथ क्या है?
हम अक्सर मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) से जुड़ी परेशानियों को स्वीकार ही नहीं करना चाहते। कई बार हम खुद से भी यह मानने को तैयार नहीं होते कि हमें अच्छा महसूस नहीं हो रहा है। हमने तनाव को इतना सामान्य मान लिया है कि लगता है इसे देखने या इस पर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं है। कई बार आसपास का माहौल भी इसमें मदद नहीं करता। परिवार या दोस्त कह देते हैं, “अच्छा सोचो, पॉजिटिव सोचो, इतना मत सोचो।” इससे व्यक्ति की वास्तविक स्थिति को समझना और भी मुश्किल हो जाता है। कई लोगों के लिए किसी थेरेपिस्ट या डॉक्टर से मदद लेना स्वीकार करना भी कठिन होता है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य को लेकर मदद लेना सामान्य मानना बहुत जरूरी है। जिस तरह चोट लगने या बुखार होने पर हम डॉक्टर के पास जाते हैं, उसी तरह अगर हम मानसिक या भावनात्मक रूप से अच्छा महसूस नहीं कर रहे हैं तो मदद लेना भी बिल्कुल सामान्य है।मिलेनियल्स और जेन जी मानसिक स्वास्थ्य को किस तरह देखते हैं?
जेन जी निश्चित रूप से मानसिक स्वास्थ्य को लेकर ज्यादा जागरूक और खुले विचारों वाली पीढ़ी है। अगर उन्हें कुछ अच्छा नहीं लग रहा है या किसी से बात करने की जरूरत महसूस होती है, तो वे मदद लेने के लिए ज्यादा तैयार दिखाई देते हैं। मिलेनियल्स के साथ स्थिति थोड़ी अलग रही है। उन्हें लंबे समय से यह सिखाया गया कि अपनी समस्याएं खुद संभालनी चाहिए। इसलिए कई बार उन्हें लगता है कि मदद लेने की जरूरत क्यों है या इससे क्या बदल जाएगा। हमें यह समझना होगा कि जिस तरह किसी व्यक्ति को शारीरिक समस्या हो सकती है, उसी तरह मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या भी हो सकती है।आत्मविश्वास और मानसिक मजबूती एक-दूसरे से किस तरह जुड़े हैं?
आत्मविश्वास और मानसिक मजबूती दोनों धीरे-धीरे विकसित होते हैं। हममें से कोई भी आत्मविश्वास के साथ पैदा नहीं होता। जब हम अलग-अलग अनुभवों से गुजरते हैं और दुनिया का सामना करते हैं, तब धीरे-धीरे हमारा आत्मविश्वास बनता है और मानसिक मजबूती भी विकसित होती है। हालांकि, कई बार किसी व्यक्ति की मानसिक मजबूती बचपन के अनुभवों से भी प्रभावित हो सकती है। अगर किसी को बचपन में बुलिंग का सामना करना पड़ा हो या माता-पिता का बर्ताव कठोर रहा हो, तो उसकी मानसिक मजबूती प्रभावित हो सकती है और उसे दूसरों की तुलना में अधिक सपोर्ट की जरूरत पड़ सकती है।अपनी भावनाओं को समझना और स्वीकार करना कितना जरूरी है?
हमारी भावनाएं हमारी जिंदगी को बना भी सकती हैं और बिगाड़ भी सकती हैं। इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि हम भावनात्मक रूप से किस स्थिति में हैं। इसके लिए पहला कदम है अपनी भावना को पहचानना। इसके बाद उसे प्रोसेस करना जरूरी है। अक्सर लोग भावनाओं को प्रोसेस करने के बजाय उन्हें दबा देते हैं या खुद को किसी दूसरी चीज में व्यस्त कर लेते हैं। कोई काम करने लगता है, सोशल मीडिया या वीडियो देखने लगता है या किसी दूसरी गतिविधि में खुद को व्यस्त कर लेता है। इससे उस समय थोड़ी राहत मिल सकती है, लेकिन भावना वास्तव में प्रोसेस नहीं होती। अगर भावनाएं लगातार दबती रहें तो उनका असर हमारे मूड, बातचीत के तरीके, रिश्तों, फोकस और प्रोडक्टिविटी पर पड़ सकता है। लंबे समय में इसका असर शारीरिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई दे सकता है।जो व्यक्ति अपनी भावनाओं को प्रोसेस नहीं कर पा रहा है तो उसे क्या करना चाहिए?
ऐसी स्थिति में किसी ऐसे प्रोफेशनल से बात करना अच्छा विकल्प है जो मदद कर सके। किसी प्रोफेशनल स्पेस में व्यक्ति को बिना जजमेंट के अपनी बात रखने का मौका मिलता है और वह खुद को सुरक्षित महसूस कर सकता है। अगर किसी कारण से प्रोफेशनल मदद लेना संभव नहीं है तो जर्नलिंग से शुरुआत की जा सकती है। अपने मन में चल रही बातों को कागज पर लिखना यानी ब्रेन डंपिंग करना एक अच्छा तरीका है। इससे मन में लगातार चल रहे विचारों को बाहर निकालने में मदद मिल सकती है। मेडिटेशन भी मददगार हो सकता है, लेकिन हर व्यक्ति के लिए मेडिटेशन करना आसान नहीं होता।भीड़ में रहते हुए भी अकेलापन महसूस होने की क्या वजह है?
आज दिखावे की जिंदगी का दबाव भी बढ़ गया है। सोशल मीडिया पर अपनी एक खास इमेज बनाए रखने की कोशिश में लोग कई बार खुद से ही कटने लगते हैं। आसपास रिश्ते और लोग होने के बावजूद वे अकेलापन महसूस कर सकते हैं, क्योंकि उनका खुद के साथ कनेक्शन कमजोर हो जाता है। कई बार हम यह सोचकर चीजें करते हैं कि दूसरे लोग हमें कैसे देखेंगे या हमें कितने लाइक्स मिलेंगे। उदाहरण के लिए, अगर कोई ऐसा आउटफिट पहन रहा है जिसमें वह खुद सहज नहीं है, लेकिन उसे लगता है कि सोशल मीडिया पर वह अच्छा दिखेगा, तो वह अपनी सुविधा और पसंद के बजाय दूसरों की प्रतिक्रिया को प्राथमिकता दे रहा है। लगातार तुलना करने से व्यक्ति अपनी खूबियों को भूलकर दूसरों की जिंदगी को बेहतर मानने लगता है। इसलिए खुद को समझना, अपनी पसंद पहचानना और खुद के साथ सहज रहना बहुत जरूरी है।महिलाएं अलग तरह के दबाव से गुजरती हैं। वे इससे कैसे डील कर सकती हैं?
सबसे पहले उन्हें अपनी क्षमताओं और प्रतिभाओं को याद रखना चाहिए। अक्सर हम अपनी कमियों पर ज्यादा ध्यान देते हैं और दूसरों की खूबियों को देखते हैं। इससे तुलना बढ़ती है और हमारा आत्मविश्वास प्रभावित होता है। इसलिए सबसे पहले खुद को याद दिलाएं कि आपके अंदर क्या अच्छा है। अपनी खूबियों को लिखें और उन्हें पहचानें। अगर कोई डाउन मोमेंट आता है या किसी बात को लेकर संदेह होता है तो उसे तुरंत कागज पर लिखें। अपने विचारों को बाहर निकालें, कुछ गहरी सांसें लें और फिर अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करें। यह भी याद रखें कि हर अनुभव का अपना महत्व है। अगर आप सफल होती हैं तो बहुत अच्छा है, लेकिन अगर किसी प्रयास में सफलता नहीं मिलती तो उससे कुछ सीखने को जरूर मिल सकता है। अगर हम हर कदम पर खुद की तुलना दूसरों से करते रहेंगे तो न तो अपनी यात्रा का आनंद ले पाएंगे और न ही अपनी उपलब्धियों को महसूस कर पाएंगे।The articles, news features, interviews, quotes, and media content displayed on this page are the property of their respective publishers and media houses. All such materials have been sourced from publicly available online platforms where our name, views, or contributions have been referenced, quoted, or featured.
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