Effective Tips to Raise a Self Sufficient Kid : असली पेरेंटिंग का मतलब सिर्फ सुविधा देना नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, जिम्मेदारी और भावनात्मक मजबूती का विकास करना भी है ताकि वे जीवन में हर स्थिति का सामना खुद कर सकें।

Tips to Raise a Confident Child : हर माता-पिता अपने बच्चों के लिए सबसे अच्छा चाहते हैं। वे उन्हें हर मुश्किल से बचाना, खुश रखना और उनकी राह आसान बनाना अपना कर्तव्य समझते हैं। लेकिन कई बार यही ‘जरूरत से ज्यादा देखभाल’ बच्चों को उन पर निर्भर बना देती है, जिससे वे खुद फैसले लेने से डरने लगते हैं। आज की तेज-रफ्तार दुनिया में बच्चों को चुनौतियों का सामना करना, गलतियों से सीखना और आत्मनिर्भर बनने के गुण सिखाना बेहद जरूरी है। मनोचिकित्सक और गेटवे ऑफ हीलिंग की संस्थापक निदेशक डॉ. चांदनी तुगनैत कहती हैं कि असली पेरेंटिंग का मतलब सिर्फ सुविधा देना नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, जिम्मेदारी और भावनात्मक मजबूती का विकास करना भी है ताकि वे जीवन में हर स्थिति का सामना खुद कर सकें।
बच को सशक्त और आत्मननर र बनानेकेललए पेर ट्स को अपनी कुछ आदत तुरंत छोड देनी चाहहए–हर समस्या का हल खुद देना, उन्ह सोचनेका मौका द :जब बचेककसी परेशानी म ह , तो तुरंत समाधान देनेक जगह उनसेपूछ ,’तुम्ह क्या लगता है,इसेकैसेसुलझाया जा सकता है?’ इससेउनम ननरय लेनेक क्षमता और आत्मववशास दोन बढेगा।
बच्चों को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के लिए पेरेंट्स को अपनी कुछ आदतें तुरंत छोड़ देनी चाहिए।
हर समस्या का हल खुद देना, उन्हें सोचने का मौका दें- जब बच्चे किसी परेशानी में हों, तो तुरंत समाधान देने की जगह उनसे पूछें, ‘तुम्हें क्या लगता है, इसे कैसे सुलझाया जा सकता है?’ इससे उनमें निर्णय लेने की क्षमता और आत्मविश्वास दोनों बढ़ेगा।
हर वक्त प्रोटेक्ट करना, उन्हें अनुभव करने दें- हर चोट, गलती या असफलता से बच्चों को बचाना स्वाभाविक है, पर इससे वो जीवन की सच्चाई नहीं सीख पाते। कभी-कभी गिरने देना, हारने देना और खुद उठना ही उन्हें मजबूत बनाता है।
उनकी जगह फैसले लेना, भरोसा करना सीखें- स्कूल, करियर या दोस्तों से जुड़े फैसले अक्सर पेरेंट्स अपने हिसाब से लेते हैं। लेकिन बच्चों को अपनी पसंद चुनने देना जरूरी है, ताकि वे अपने चुनाव की जिम्मेदारी लेना सीख सकें।
हर गलती पर डांटना गलत, गलती को सीखने का मौका बनाएं- गलतियां हर बच्चे के सीखने की प्रक्रिया का अहम हिस्सा होती हैं। गलती करने पर बच्चे को डांटने या डरा देने की जगह उनसे शांत मन से बात करें, ‘इससे तुमने क्या सीखा?’ यह तरीका उन्हें सोचने, समझने और अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने की आदत सिखाता है।
दूसरों से तुलना करना, आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचाता है- ‘देखो, वो तुमसे बेहतर है’ जैसे वाक्य बच्चों का आत्मविश्वास तोड़ देते हैं। हर बच्चे की यात्रा अलग होती है। उनकी कोशिशों को सराहना ही उन्हें बेहतर बनने की प्रेरणा देती है।
माता-पिता का असली प्रेम बच्चों को हर गलती से बचाने में नहीं, बल्कि उन्हें गिरकर कैसे संभलना है, यह सिखाने में है। जब आप अपने बच्चे पर भरोसा करते हैं, तो वो अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेना सीखता है। उन्हें रास्ता दिखाएं, लेकिन मंजिल तक खुद चलने दें। यही स्वतंत्रता, आत्मविश्वास और भावनात्मक मजबूती की सबसे सच्ची शिक्षा है। बच्चे तभी खिलते हैं जब माता-पिता उनकी उड़ान पर विश्वास करते हैं, न कि उनके पंखों को थामे रहते हैं।
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