हम सब ने अक्सर लोगों को यह कहते सुना है कि हमारे बोलने का तरीका हमारे व्यक्तित्व और विचारों के बारे में बहुत कुछ बयां करता है। बातचीत के इसी लहजे से हम अनजाने में ही सही, दूसरों को परखने भी लगते हैं। मगर क्या आपने कभी सोचा है कि बच्चों के बातचीत करने का तरीका उनकी आने वाली मेंटल हेल्थ के बारे में भी बहुत कुछ संकेत दे सकता है? अमूमन लोग बच्चों के बोलने के अजीब तरीके या भाषा के लहजे को नजरअंदाज कर देते हैं और यह मानकर छोड़ देते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ यह ठीक हो जाएगा। नीचे लेख में अध्ययन और कोच, हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट और साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से से जानें बच्चों के बोलने का स्टाइल उनकी मेंटल हेल्थ का भविष्य कैसे तय करता है।

बच्चे के बोलने के तरीके पर रिसर्च क्या कहती है?

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के हालिया अध्धयन से सामने आया कि बच्चों की बातों के विषय से ज्यादा उनके बोलने का स्टाइल मायने रखता था। इसका मतलब यह है कि बच्चे अपने वाक्य किस तरह बना रहे थे जैसे कि और, को और लेकिन जैसे छोटे कनेक्टर शब्दों का उपयोग करना। अगर बच्चों की भाषा और वाक्य-संरचना से जुड़े ये संकेत लंबे समय तक बने रहें, तो यह भविष्य में उनके मानसिक स्वास्थ्य में आने वाली गंभीर दिक्कतों की ओर इशारा करते हैं। बता दें कि यह रिसर्च 9 से 13 वर्ष की आयु के 200 से अधिक बच्चों पर किया गया है।
 

बच्चों की बातों से कैसे चलता है मानसिक स्थिति का पता?

जब बच्चे खेलते-कूदते या आपस में बात करते हैं, तो वे अपनी दुनिया के बारे में बहुत कुछ अनजाने में ही कह जाते हैं। अगर कोई बच्चा बहुत अधिक नकारात्मक बातें करता है, खुद को लेकर हीन भावना रखता है या बात-बात पर अत्यधिक डर और चिंता जाहिर करता है, तो यह उसके भीतर चल रहे मानसिक उथल-पुथल का संकेत हो सकता है।
 
वहीं जो बच्चे खुलकर अपनी भावनाएं, समस्याओं पर खुलकर चर्चा करते हैं और पॉजिटिव सोच रखते हैं, उनका मानसिक स्वास्थ्य भविष्य में मजबूत रहने की अधिक संभावना होती है। माता-पिता उनके बोलने के तरीके से यह भांप सकते हैं कि वे अंदर से कितने सुरक्षित या असहज महसूस कर रहे हैं।

नेगेटिव और पॉजिटिव बातों का असर

बच्चों की बातचीत में इस्तेमाल होने वाले शब्द उनके मानसिक स्वास्थ्य का आईना होते हैं। यदि बच्चा लगातार निराशाजनक बातें बोलता है, जैसे “मैं कुछ नहीं कर सकता” या “मुझसे कोई प्यार नहीं करता”, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस तरह की बातचीत भविष्य में डिप्रेशन या एंग्जायटी जैसी समस्याओं का संकेत हो सकते हैं।
वहीं दूसरी तरफ, कुछ बच्चे अपनी गलतियों से सीखते हैं और अपनी भावनाओं को शब्दों में ढालकर बड़ों से साझा करते हैं। साथ ही चुनौतियों का सामना करने की बात करते हैं। इस तरह की कम्युनिकेशन स्किल्स यह बताती है कि उनकी मानसिक स्थिति भविष्य में स्वस्थ रहेगी।

बच्चों की मेंटल हेल्थ को बेहतर बनाने के लिए क्या करें?

बच्चों की मेंटल हेल्थ को बेहतर बनाने और उनके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए यह बहुत जरूरी है कि माता-पिता उनकी बातों को ध्यान से सुनें। अक्सर बड़े बच्चों की बातों को बचकानी समझकर टाल देते हैं, जिससे बच्चे अपनी भावनाएं अपने तक ही सीमित रखने लगते हैं और अंदर ही घुटने लगते हैं।
घर में ऐसा माहौल होना चाहिए जहां बच्चा बिना किसी डर के अपने मन की हर बात कह सके। आप जब बच्चों से दोस्तों की तरह बात करते हैं। उनकी समस्याओं को समझते हैं और उन्हें सही मार्गदर्शन देते हैं, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे मानसिक रूप से मजबूत बनते हैं। अगर आपका बच्चा छोटा है, तो उनके बातचीत करने के तरीके पर खास ध्यान दें। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।  

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