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    Home » एक्स्ट्रा-मैरिटल रिश्तों वाले ऐप बदल रहे हैं शादी के मायने

    एक्स्ट्रा-मैरिटल रिश्तों वाले ऐप बदल रहे हैं शादी के मायने

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    भारत में कई लोग शादी के बाहर अपनी भावनात्मक और शारीरिक जरूरतें पूरा करने के लिए 'ग्लीडन' जैसे ऐप्स को अपना रहे हैं. बेंगलुरु, दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों के अलावा लखनऊ और पटना जैसे शहरों में भी इसके यूजर तेजी से बढ़े हैं.
    DWDW Connection & Care April 16, 20267 Mins Read1 Views
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    अनामिका (बदला हुआ नाम) पिछले एक साल से ‘ग्लीडन’ ऐप का इस्तेमाल कर रही हैं. उन्हें किताबें पढ़ना, संगीत सुनना और देर रात ड्राइव पर जाना पसंद है. वह झांसी में एक शोरूम में काम करती हैं. शादी को करीब पांच साल हो चुके हैं. इसी दौरान अनामिका को एहसास हुआ कि उनके और उनके पति की दिलचस्पियां एक-दूसरे से काफी अलग हैं. अनामिका बताती हैं, “मेरे और मेरे पार्टनर के बीच पहले जैसा जुड़ाव और आकर्षण अब महसूस नहीं होता. मैं अपनी जिंदगी में एक्साइटमेंट और एक गहरा रिश्ता चाहती थी. मुझे लगता है कि शादी के बाहर अपने लिए खुशी और संतुष्टि तलाशना गलत नहीं है. मैं समाज के बनाए उस ढांचे में खुद को फिट करने से थक चुकी हूं, जहां एक महिला से हमेशा एक ‘अच्छी पत्नी’ और ‘आदर्श मां’ बनने की उम्मीद की जाती है.” मोबाइल ऐप पर टिंडर डेटिंग ऐप

    क्या सच्चा प्यार डेटिंग ऐप पर मिलता है?

    ‘ग्लीडन’ एक ऑनलाइन डेटिंग प्लेटफार्म है जिसे खास तौर पर शादीशुदा लोगों के लिए डिजाइन किया गया है. इस पर वे सुरक्षित और गोपनीय तरीके से रिश्ते तलाश सकते हैं. ये ऐप अब सरकार के रडार पर है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से ‘ग्लीडेन’ को लेकर रिपोर्ट मांगी है. यह कदम ‘सेवा न्याय उत्थान फाउंडेशन’ की शिकायत पर उठाया गया. आरोप है कि ग्लीडन भारत में एक्स्ट्रा-मैरिटल संबंध को बढ़ावा देता है. प्लेटफार्म पर फर्जी प्रोफाइल, महिलाओं व नाबालिगों के शोषण का जोखिम, डाटा सुरक्षा से जुड़े सवाल और नैतिक-सामाजिक प्रभाव जैसी चिंताएं मौजूद हैं.

    भारत में तेजी से बढ़ रहे हैं यूजर्स

    भारत में रिश्तों को जीने और निभाने का तरीका खामोशी से बदल रहा है. साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एडल्ट्री को अपराध की श्रेणी से हटा दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यक्ति की पसंद, गरिमा और यौन स्वायत्तता उसके मौलिक अधिकार हैं. आपसी सहमति से बने निजी संबंधों में सरकार या कोर्ट का दखल नहीं होना चाहिए. ‘ग्लीडेन’ ऐप के भारत में 40 लाख से ज्यादा यूजर हैं. यह ऐप महिलाओं के लिए फ्री है. पिछले दो सालों में महिलाओं के साइन-अप में 148 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. ऐप के द्वारा प्रकाशित डाटा के अनुसार कई लोग अपनी शादी में स्थिरता बनाए रखते हुए, बाहर भावनात्मक जुड़ाव या कुछ नया तलाश रहे हैं. पुरुष आमतौर पर 25 से 30 साल की कम उम्र की पार्टनर ढूंढते हैं. जबकि महिलाएं 30 से 40 साल की उम्र के पुरुषों को प्राथमिकता देती हैं. शहरों की बात करें तो बेंगलुरु में इसके सबसे अधिक 18 प्रतिशत यूजर हैं. हैदराबाद में 17 प्रतिशत, दिल्ली में 11 प्रतिशत, मुंबई  में 9 प्रतिशत और पुणे में 7 प्रतिशत यूजर एक्टिव हैं. अनामिका कहती हैं, “मुझे अपनी शादी को सुधारने में समय और ऊर्जा लगानी चाहिए. लेकिन मैं यह समझ चुकी हूं कि मेरे और मेरे पति के बीच की बुनियादी समस्याएं कभी खत्म नहीं होंगी. हम हमेशा लड़ते रहते थे. मैं ऐप के जरिए दो लड़कों से रेस्तरां में मिली. मुझे खाना बनाना पसंद है, तो मैं उनके लिए घर से लंच बनाकर ले जाती थी और वे उसकी तारीफ भी करते थे.” क्या उन्हें इसका पछतावा है? अनामिका जवाब में कहती हैं, “नहीं. ऐप पर कोई किसी को जज नहीं करता. अन्य लोगों से मिलकर और बात करने से मैं पहले से ज्यादा खुश रहने लगी हूं. पति के साथ मेरी बहस भी कम होने लगी है. यह बदलाव देखकर वह भी खुश नजर आते हैं.” यह दिखाता है कि आर्थिक आजादी ने महिलाओं को यह सोचने की ताकत दी कि उनकी इच्छाएं और जरूरतें भी मायने रखती हैं. साइकोथेरेपिस्ट और रिलेशनशिप एक्सपर्ट डॉ. चांदनी टुगनैत ने डीडब्ल्यू से बात की. उनके मुताबिक, पहले शादी टूटने का डर इसलिए ज्यादा था क्योंकि महिलाओं को अकेले जीना मुश्किल लगता था. अब यह डर धीरे-धीरे कम हो रहा है.

    छोटे शहरों में एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर

    कुछ साल पहले तक अगर कोई शादी के बाहर किसी से मिलना चाहता, तो यह इतना आसान नहीं था. डॉ. चांदनी बताती हैं कि ऐसे रिश्तों की शुरुआत अक्सर अचानक हुई मुलाकातों से होती थी. यह धीरे-धीरे आगे बढ़ता. यहां काफी रिस्क और मेहनत दोनों शामिल होते थे. लेकिन ग्लीडन जैसे ऐप्स ने इस प्रक्रिया को नया रूप दिया है. उनके मुताबिक, “इन ऐप्स ने लोगों के व्यवहार के साथ अटैचमेंट और लॉयल्टी को देखने का नजरिया बदल दिया है. पहले चीटिंग में एक गिल्ट होता था. अब यह एक स्क्रॉल की तरह नॉर्मल फील होने लगा है.” ग्लीडन के खुद के डाटा में टियर-2 और टियर-3 में यूजरों की संख्या अधिक बताई है. लखनऊ और पटना जैसे शहरों में पुरुष और महिलाओं के बीच इसकी लोकप्रियता बढ़ी है. डॉ.चांदनी ने इसके पीछे कई कारण बताए. पहले यह सिर्फ मेट्रो शहर तक सीमित था. अब छोटे शहरों में भी सस्ता इंटरनेट डाटा प्लान और अफोर्डेबल स्मार्टफोन हर किसी की पहुंच में हैं. साथ ही ओटीटी और सोशल मीडिया ने इन शहरों के लोगों को एक अलग तरह की लाइफस्टाइल दिखाई है. डॉ.चांदनी ने बताया, “छोटे शहरों में नई पीढ़ी वेब सीरीज देख रही है, घूम रही है और कमा रही है. फिर भी शादी के फैसले अब भी घरवाले ही लेते हैं. इस पीढ़ी की इच्छाएं और सपने बदल चुके हैं. मगर उनके आसपास का सामाजिक ढांचा वैसा ही है.”

    तलाक से आसान है बाहर रिश्ता रखना

    लोग अक्सर शादी तोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. तलाक या अलग होना आज भी समाज में एक बड़ा टैबू माना जाता है. ऐसे में पार्टनर शादी के रिश्ते से बाहर किसी को ढूंढते हैं. डिजिटल प्लेटफॉर्म उन्हें ऐसा सुरक्षित स्पेस देते हैं, जहां वे अपनी पहचान छिपाकर बातचीत कर सकते हैं. यही फीचर उन्हें इन प्लेटफॉर्म्स की ओर खींचता है. देश में तलाक के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है और अब यह सिर्फ शहरी इलाकों तक सीमित नहीं रहा है. मनीकंट्रोल के सर्वे में बताया गया कि साल 2017-18 से 2023-24 के बीच शहरी पुरुषों में तलाक की दर 0.3 प्रतिशत से बढ़कर 0.5 प्रतिशत हो गई है. जबकि शहरी महिलाओं में यह दर 0.6 प्रतिशत से बढ़कर 0.7 प्रतिशत तक पहुंची है. वहीं, ग्रामीण इलाकों में भी खासकर महिलाओं के बीच तलाक और अलग रहने के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई. लेकिन यह कहना गलत होगा कि इसकी अकेली वजह ये प्लेटफॉर्म्स हैं. डॉ. चांदनी बताती  हैं, “कुछ मामलों में पार्टनर बाहर रिश्ता पाकर घर में ज्यादा शांत और टॉलरेंट हो जाते हैं. यह एक तरह का कॉम्प्रोमाइज है. यह हेल्दी नहीं है. लेकिन शादी बची रहती है.”

    ऐप्स से जुड़े कानूनी प्रावधान

    सुप्रीम कोर्ट में वकील स्नेहा सिंह महिला एवं बच्चों के मामलों की विशेषज्ञ हैं. वह समझाती हैं कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर व्यक्ति को जिंदगी अपनी पसंद से जीने का अधिकार है. इसमें भावनात्मक और निजी रिश्तों के फैसले भी शामिल हैं. दो बालिग लोग आपसी सहमति से कोई रिश्ता बनाते हैं, तो वह कानूनन गलत नहीं माना जाता. एडल्ट्री अपराध नहीं है. यानी अब यह आपराधिक मामला नहीं, बल्कि एक सिविल मुद्दा है, जिसे तलाक के आधार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. स्नेहा आगे  बताती हैं, “इसी वजह से ऐसे ऐप्स का इस्तेमाल भारत में अवैध नहीं है. अगर पत्नी अपने पति को या पति अपनी पत्नी को ऐसे ऐप्स इस्तेमाल करते हुए पकड़ता है, तो इसे सिविल मामले में ‘चीटिंग’ माना जाएगा. मगर भारत में अभी भी कई महिलाओं के लिए तलाक लेना आसान नहीं होता. उन पर सामाजिक दबाव होता है. फिर तलाक की प्रक्रिया लंबी और थकाने वाली है.” ऐसे ऐप्स का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं भी अगर किसी तरह की परेशानी का सामना करती हैं, तो वे कानून का सहारा ले सकती हैं. स्नेहा ने उदाहरण दिया, “अगर कोई व्यक्ति अश्लील सामग्री भेजता है या अभद्र व्यवहार करता है, तो आईटी एक्ट के तहत शिकायत की जा सकती है.” अगर इन ऐप्स पर किसी को धमकी दी जाती है या परेशान किया जाता है, तो कानून में इसके खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है. फोटो का गलत इस्तेमाल और फर्जी प्रोफाइल बनाने पर भी भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत धोखाधड़ी और जालसाजी में केस दर्ज हो सकता है.

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